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युगर्षि भगवान श्री शरणानंद जी

भगवान शरणानन्द दड़ौली धाम रेवाड़ी (हरियाणा) –

गुरुदेव ही मात-पिता , गुरुदेव ही भगवान। 

गुरुदेव की सेवा ही , मेरा श्रेष्ठ कर्म प्रधान ।।उद्देश्य:- इस बेबसाइट का प्रमुख ध्येय समाज कल्याण , धार्मिक उत्थान , उद्धार और अपने आध्यात्मिक गुरुदेव युगर्षि भगवान श्री शरणानन्द जी के अलौकिक प्रवचन , अमृतवाणी , उपदेश , विचार , नियम ,  दिशा-निर्देश , संकल्प और सुस्पष्ट सिद्धांतो के प्रचार-प्रसार  हेतु

जन-जन तक पहुंँचाने के लिए चलाई जाती है। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म की सेवा करना और सभी यज्ञमान भक्तों को एक मंच पर जोड़ना है।

 

 

गुरु परिचय
ओ३म्!! धर्मो रक्षति रक्षितः !!
।। ॐ असतो मा सद् गमय – ॐ सत्यं वदं धर्मं चर ।।


दसों दिशाएँ दीप्त हो उठी, प्राप्त कर पुण्य प्रकाश तुम्हारा।
लिखा जा चुका अनल अक्षरों में, स्वर्णिम् इतिहास तुम्हारा।।2)
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
आज हम एक महान् युगर्षि संत श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी की पुण्य और पावन कथा सुनाते हैं। ऋषिवर, मुनिवर, गुरुवर और धर्म धुरन्धर के पुण्य- पावन अमर इतिहास को कोटि कोटि अपना शिश झुकाते हैं। सत्य रुप में जो यहाँ पुजे जाते हैं। दिन था अश्विन मास कृष्ण पक्ष, इन्द्रा-एकादशी , शनिवार तिथि, 17 सितम्बर,1938, भारत के एक प्रान्त हरियाणा में गाँव है फतेहपुरी। उस गाँव के यादव कुल में जन्मा एक बालक प्यारा। बालक की माँ का नाम था श्रीमती पार्वती देवी और पिता थे श्री केहर सिंह जी। उस दम्पति से हम सबने एक अनमोल निधि थी पाई। माता-पिता थे बड़े धार्मिक संस्कारों के औजस्वी ईंसान। हम फतेहपुरी की पुण्य धरा ( जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी) को अपना शिश झुकाते है। नामकरण की विधि हुईं श्री केहर सिंह जी के घर और प्यारा बेटा बन गया मंगतूराम। पांचवे वर्ष स्वयं पिता ने जाने-अनजाने में ही दिया ओ३म् अक्षर का ज्ञान। आंठवे वर्ष कुल गुरु जी ने दिया उपदेश- तुम घर में बनकर आये ज्येष्ठ, हो जाओ तैयार करने को सर्वश्रेष्ठ। इस प्रकार मंगतूराम अपने जीवन पथ पर आगे चरण बढ़ाते हैं। कभी कभी हम इंसान भगवान् की लीला को समझ नहीं पाते हैं और महापुरुष के लक्षण बच्पन में दिख जाते हैं। एक दिन माँ से पुत्र बोला- माँ मुझे दुनिया है पानी, मैं मुक्ति खोजने जाऊँगा- मुझे पानी है जीवन की कहानी। गर्वित और हर्षित मन से माता पिता अपने लाडले विदा कर देते हैं और मंगतूराम अपनी उच्चोतर शिक्षा के लिए रूड़की के इंजीनियरिंग कॉलेज (आई.आई.टी) में प्रवेश लेने जाते हैं।
3)
राष्ट्रीय हित एवम् समाज सेवा के पथ की और अग्रसर
श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी अपनी इंजीनियरिंग कि शिक्षा के एक वर्ष अध्ययन उपरांत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी एवं प्रसिद्ध समाज सुधारक आचार्य श्री विनोबा भावे जी के विचारों से जुड़ गए। स्वामी जी अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर तत्काल उनके द्वारा देश में चल रहे भू-दान यज्ञ आन्दोलन में सक्रिय रूप से सम्मलित हो गए। इसी दौरान स्वामी जी का मिलन एक ऐसी हस्ती से हुआ, जिसने अपनी युवावस्था में अपने सुनहरे एवं उज्जवल भविष्य को तिलांजलि देकर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा। एक सन्यासी चौला धारण करके राष्ट्र, धर्म और समाज सेवा के पथ प्रदर्शक बन चुके थे। वे महान् विभुति कोई और नहीं थे, बल्कि स्वयं जिला मुख्य न्यायाधीश, बिजनौर, उत्तर प्रदेश, जो वर्तमान में सम्मानित संत स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज के नाम से विख्यात थे। अब आचार्य श्री विनोबा भावे जी का भू-दान यज्ञ आन्दोलन जब समाप्ति की ओर जा रहा था, तब वहाँ से स्वामी शरणानन्द जी दिल्ली में स्थित श्रेद्वय स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के आश्रम “श्री रामशरणम् धर्मार्थ ट्रस्ट” में कुछ दिन ठहरे। कुछ समयावधि के उपरांत स्वामी जी वहाँ से आकर श्रेद्वय स्वामी परमानन्द जी महाराज के सान्निध्य में भक्ति आश्रम, रामपुरा, रेवाड़ी में रहने लगे। स्वामी जी वहाँ पर रहते हुए झज्जर गुरुकुल के लिए भी अपना योगदान एवम् सेवायें प्रदान करने लगे।
4) शुद्ध चेतैन्य ब्रह्मचारी सुर्योदय
आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर अनन्त यात्रा और मंगतूराम से बाबा मंगल देव का अवतरण – मानव जीवन की दिशा आध्यात्म की ओर मोड़ी जाए, यह सब एक जन्म में संभव नहीं है। ये तो पूर्वार्जित संस्कार हैं जो व्यक्ति को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित करते हैं। सनातन् धर्म, संस्कृति ऐसा माना जाता है कि पूर्व जन्म के संस्कार जाग्रत होने पर स्वतः ही ऐसी प्रेरणा जाग्रित होती है। स्वामी शरणानन्द जी भक्ति आश्रम, रामपुरा, रेवाड़ी को त्यागकर, श्रेद्वय स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज के आश्रम बिजनौर, उत्तर प्रदेश में वापिस पहुंच गए। अपने
आध्यात्मिक गुरु श्रेद्वय स्वामी सच्चिदानन्द जी से शिक्षा दीक्षा ले बने शुद्ध चेतैन्य ब्रह्मचारी।
हम कभी कभी भगवान् की लीला समझ नहीं पाते हैं।
इनके व्यक्तिव, व्यवहार और आचरण से आकर्षित होकर श्रेद्वय स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज ने इनका नामकरण मंगतूराम से बदल कर मंगल देव रख देते हैं। नियति ने कुछ और ही निर्धारित था- कहते हैं ना कि पुत के पांव पालने में दिखाई देने लग जातें हैं। कुछ समय उपरांत वहाँ से स्वामी जी ने अपने सदगुरु श्रेद्वय स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज की आज्ञा एवं आशिर्वाद लेकर उनको कोटि कोटि नमन् करके अपनी नम आखों में आश्रम से विदाई ली।
5)
श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी अब जोशीहाट, नीमराणा (राज) में स्थित श्रेद्वय बाबा खेतानाथ जी के आश्रम में आकर अपनी सेवायें प्रदान करने लगे। विकास एवं जन जागरण की छवि को देखकर श्रेद्वय बाबा खेतानाथ जी महाराज ने कहा की महाराज जी मुझे अहसास हो रहा है कि इस समाज और प्रदेश को आपकी अत्यंत आवश्यकता है। आपके अमुल्य ज्ञान एवं अनमोल समय के समन्वय को उपयुक्त स्थान की आवश्यकता है। बाबा खेतानाथ और स्वामी जी ने गहन अध्ययन एवं मंथन के उपरांत स्वामी जी ने समाज हित के लिए अपने पृत्रिक गाँव फतेहपुरी अपनी जन्मभूमि को ही अपनी कर्मभूमि बनाने का फैसला किया। स्वामी शरणानन्द जी वहाँ से अपने पृत्रिक गाँव फतेहपुरी में आ गये और जोहड़ पर एक कुटिया बना कर रहने लगे। आरम्भिक दिनों में सब कुछ इतना आसान नहीं था। गाँव, समाज, परिवार, रिश्तेदारों सभी ने काफी दबाव बनाया की घर, परिवार, सामाजिक, सांसारिक बन्धनों के मुलभुत ढांचे में वापिस लौट आओ। इन सब परिस्थितियों के बाबजूद स्वामी जी अपने अटल एवम् कठोर फैसले पर अडिग रहे। अपने लाडले पुत्र के इस पर्वत जैसे अटल फैसले के समुम्ख माँ की करुणामयी ममता और पिता के दृढ धैर्य* ने अपनी हार को ही अपनी जीत के रूप में स्वीकार किया। अपने लाडले पुत्र को एक महान् संत होने का आशीर्वाद देकर विदा किया।
6)
श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम की स्थापना – बांटोगे तो बरकत होगी- जोड़ोगे तो हरकत होगी
अक्सर कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में सृष्टि एक बार सम्पूर्ण संतुलन परिवर्तन अवश्य ही सृजित करती है। इसी दौरान श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी ने श्री दड़ौली धाम की पावन धरा का अपनी तपोभूमि, तपस्थली के रूप में अपना अंतिम चुनाव करते हैं । स्वामी शरणानन्द जी दोहपर की तपती धुप में गर्म गर्म बालू को अपने शरीर पर मल मल कर, पवित्र हृदय से कठोर तपस्या करके माँ गायत्री मंत्र का जाप किया करते थे। विशेषरूप से श्रेद्वय बाबा खेतानाथ जी महाराज इनके साथ में एक सत्य कर्मयोगी रुपी सह भागीदार संत हुआ करते थे। श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी ने 23 मार्च (सोमवार) सन् 1964 में गाँव दड़ौली के बीहड़ में श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम की स्थापना की*। स्वामी जी ने जन मानस के सहयोग से आश्रम में धीरे-धीरे भवनों का निर्माण कार्य आरम्भ किया। जिनमें गीता भवन, यज्ञशाला, पुस्तकालय, सत्संग हॉल, संत भवन, ऋषि कुटिया, भोजनालय इत्यादि प्रमुख है।
7)
बाबा मंगल देव से श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी सूर्योदय
सबका दुख अपना दुख समझु – धर्म यही हो मेरा।
अपने अवगुण सारे गुण में बदलु – कर्म यही हो मेरा ।।
हे नाथ-अब तो ऐसी दया हो-ये जीवन निर्रथक जाने ना पाये।ये मन न जाने क्या-2 बनाये-पर कुछ बन न पाया इसके बनाये
श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी ने इसी दौरान श्रेद्वय स्वामी सोमानन्द जी महाराज, गांव नूरगढ़ आश्रम के महंत के विचारों से काफी प्रभावित हुए। स्वामी शरणानन्द जी ने 20 अप्रैल (गुरुवार) सन् 1967 में नुरगढ आश्रम के महंत श्रद्धेय स्वामी सोमानन्द जी महाराज को अपना धार्मिक गुरु मानकर भगवा वरकल धारण करके संत के रूप में पदार्पण किया।
8)
“संकल्प से सिद्धि प्राप्ति –
श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी के सर्वश्रेष्ठ देखरेख में श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम अब सुव्यवस्थित रूप में चल रहा था। वैदिक धर्म, संस्कृति और वेदों में लिखा है- कि सृष्टि-प्रकृति का नियति का नियम है कि वह निश्चित समय पर कर्मो के अनुकूल परिणाम जीव को अवश्य प्रदान करतीं हैं।
माँ पार्वती का पुत्र पवित्र भाव से कर रहा था, माँ गायत्री मंत्र का जाप। माँ गायत्री ने निष्पाप भाव से कह दिया, माँ पार्वती के पुत्र सिद्ध हो तेरे जाप।
श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी ने एक कोटि अर्थात (करोड़) गायत्री मंत्र का जाप पूर्ण किया। स्वामी जी को माँ गायत्री वाक् सिद्धि प्राप्त हो गई। माँ गायत्री और माँ सरस्वती दोनों ही अपने मधुर स्वर में हमेशा के लिए श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी की वाणी में विराजमान हो गई। गायत्री का यह महत्व है कि जो मनुष्य अर्धरात्रि को गायत्री का जाप करता है वह वचन सिद्ध हो जाता है। हमने देखा स्वामीजी ने जो भी कभी वचन कहा वह सदैव उसी रूप में पूर्ण हो गया।
9)
सतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सकिर – युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी ने आश्रम में प्रतिदिन प्रातः और सायं हवन यज्ञ और प्रत्येक माह के दूसरे रविवार* को मासिक हवन यज्ञ के साथ सत्संग तथा सामाजिक चेतना के नियमित कार्यक्रम आरम्भ किए। स्वामी जी गीता महोत्सव को एक त्यौहार स्वरूप मनाते थे। स्वामी शरणानन्द जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में प्रत्येक सोमवार मौनव्रत एवं एक वस्त्र धारण करने का व्रत का आजीवन निर्वाहन किया। हर वक्त चाहे सर्दी हो, चाहे गर्मी हो अपने शरीर को केवल एक ही भगवा वस्त्र से ढक कर रखते थे। स्वामी जी ने अपने शारीरिक सुख के लिए कभी कुछ नहीं चाहा। स्वामी जी अपने के सम्पूर्ण जीवन में गौ माता, राष्ट्र माता, नारी शक्ति, साधु संतों, विरांगनाओ, वीर जवानों, शहीदों के प्रति प्रेम और सम्मान सदैव ही अतुलनीय रहा। स्वामी जी प्यारे बच्चों के प्रति अगाध् प्रेम की अमृतधारा निरन्तर बहती रहती थी। श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी महाराज के विचारों से ऐसी ध्वनि पैदा होती थी कि उसे सुनने के बाद अन्दर का अहंकार गायब हो जाता था। स्वामी जी के नजदीक बैठते ही सब से पहले यह महसूस होने लगता है कि हमारे अन्दर में खोट कहां पर है। और उससे छुटकारा कैसे पाया जाया जा सकता है। श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी को वाक् सिद्धी प्राप्त थी। अतः जो भी भक्त उनके पास किसी भी प्रकार की अपनी समस्या लेकर आते थे, तो वे उनके पास से संतुष्ट होकर ही वापिस घर जाते थे।
10)
युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी अक्सर कहते थे कि:-
जब आप सच्चे हो कोई छल कपट नहीं, कोई प्रपंच नहीं, कोई राजनीति नहीं, तो हमेशा देने की सोचना चाहिए, कभी भी लेने की नहीं सोचना चाहिए। उस वक्त ऊपरवाला बड़ा खुश होता है और बोलता की तुम बस चलता जा, मैं हमेशा तेरे साथ रहुंगा। आपको भी अगर अपने मनुष्य जीवन में कामयाब होना है, तो एक नियम का संकल्प ले लो। हमनें अपना कोई भी शिष्य ना बनाने का संकल्प ले रखा है। गुरु शिक्षा-दीक्षा यही है कि ओ३म् नाम का सुमिरन करो। वेदों में अर्थशास्त्र का सुत्र है अपने सामर्थ्य के अनुसार, अपने परिवार की रजामंदी से अपनी कमाई हुई धन राशि का 1/10 वा भाग श्रद्धापुर्वक, निष्ठावान होकर निष्पक्ष और निष्पाप भावना के उद्देश्य से समाज में पतीत्- पावन, पीड़ित, असहाय लाचार, कमज़ोर, गऊरक्षा, जीव जंतु, पशु पक्षी, मन्दिर, धर्म उत्थान, साधु संतों, समाज, गाँव, राष्ट्र, सष्टि प्रकृति एवं जरूरतमंद की सहायता और सहयोग करके अपने जीवन को भव के पार उतारो।
11)
जब आप सच्चे हो कोई छल कपट नहीं, कोई प्रपंच नहीं, कोई राजनीति नहीं है। हमेशा देने की सोचना चाहिए कभी भी लेने की नहीं सोचना चाहिए। उस वक्त ऊपरवाला बड़ा खुश होता है और बोलता की तुम बस चलता जा, मैं हमेशा तेरे साथ रहुंगा।
यदि जीवन में वास्तव में कल्याण चाहते हो, निखरना चाहते हो तो एक ही गुरुमंत्र है- शुभ कर्म करो और आगे बढ़ो । और अपने जीवन सद् ग्रहस्थ-संन्यासी जैसा आचरण करो।
कोई भी एक नियम ले लो।
जो मरा पिछे बतावै मुक्ति, वो झूठा गुरु और झूठी युक्ति
सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण विषय यह है कि हम अपने सतगुरु स्वामी शरणानन्द जी के आध्यात्मिक विचारों-संदेशो पर चलकर हमने कितना सीखा और उसको कितना अपने जीवन में परिवर्तित किया है।
12)
यदुवंश में प्रारंभ से लेकर आज तक समाज मे चरित्र निर्माण और समाज को दिशा प्रदान करने के लिए अनेकों महान् संत हुए हैं। जिन्होंने समय समय पर समाज मे ज्ञान, चरित्र, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक सरोकार एवं संगठन निर्माण के क्षेत्र में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है। युगर्षि स्वामी शरणानन्द जी देश के सर्वश्रेष्ठ एवम् महान् संतों में से एक है। स्वामी जी ने हमेशा ही जीवन में समय का बड़ा ही महत्व बताया है। स्वामी जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज के उत्थान में लगा दिया। स्वामी जी भक्तियोग, ज्ञानयोग एवं कर्मयोग की त्रिवेणी थे। स्वामी जी श्रीमद् भगवत गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद, मनुस्मृति, सत्यार्थ प्रकाश एवं चरकसंहिता के प्रखंड विद्वान थे। स्वामी जी ने समाज को उचित दिशा प्रदान करने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है। श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी आध्यात्मिक, सामाजिक, शिक्षा के क्षेत्र में तथा सामाजिक कुरीतियों के निवारण के लिए आजीवन पर्यंत लगे रहे। स्वामी जी सभी प्रकार की सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज प्रथा, मृत्युभोज, बालविवाह, व्यसन आदि को समाज की प्रगति में बाधा मानते थे तथा इनके उन्मूलन के लिए जीवन भर कार्य करते रहे। स्वामी जी भांग, सुल्फा, गांजा , चिलम, चाय और धूम्रपान जैसे व्यसनों को पसंद नही करते थे और ना ही इनका सेवन करते थे। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वामी शरणानन्द जी के अथक् प्रयासों से ही राजकीय विद्यालय दड़ौली एवम् राजकीय कन्या विद्यालय फतेहपुरी, हैल्थ सैन्टर फतेहपुरी की स्थापना सम्भव हुईं। स्वामी जी ने अपने ही आश्रम में श्री कृष्ण ज्ञान ज्योति आर्य गुरूकुल महाविद्यालय की स्थापना की। इनके अतिरिक्त अनगिनत संस्थाओं के निर्माण में इनकी प्रेरणा, योगदान रहा है।
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ओ३म् पथ पर अग्रसर का उद्घोष एवम् मंगलमय गमन् * युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी एक महान् सिद्ध संत थे।जिन्हें अपने ब्रह्मलीन होने का पुर्व अहसास का उद्घोष रविवार,11 अप्रैल 2021 को प्रातः लगभग समयानुसार 08 बजकर 15 मिनट हो गया था। जब स्वामी जी समस्त भक्तों के सम्मुख सार्वजनिक रूप में यह उद्घोष किया था कि अब हमारा ओ३म् में लीन होने का वक्त आ गया है। वहाँ पर उपस्थित समस्त भक्तजन इस प्रकार के शब्दों को सुनकर आश्चर्य चकित थे। युगर्षि”-श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी महाराज ने एक अपूर्व एवम् मंगलमय यात्रा 83 वर्ष पहले आरम्भ की थी जो आज 22 अप्रैल (गुरुवार) 2021 को प्रभु ध्यान में ॐ के समर्पण भाव के साथ अंतिम यात्रा 82 वर्ष 7 महीने 5 दिन पूर्ण करके भगवान् श्री हरि विष्णु जी के परम् धाम, श्री बैकुंठ धाम को सदा सदा के लिए गमन् (प्रस्थान) कर गए।
जैसे ही यह ह्रदय विदारक सुचना आम जन मानस तक आई:-
विश्व प्रख्यात आध्यात्मिक विचारक एवं धार्मिक सतगुरु *
युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी महाराज ब्रह्मलीन हो गये हैं। समस्त भक्तजनों, श्रद्धालुओं, प्रत्येक सामान्य नागरिक, प्रतिनिधियों, अधिकारियों और समूचे क्षेत्र में शोक की एक लहर दौड़ गई। युगर्षि श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी महाराज की पुर्व इच्छानुसार आश्रम प्रबंधन कमेटी ने स्वामी जी के अपने श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम में धार्मिक, रिति रिवाज, सांस्कृतिक परम्पराओं और साधु संतों की मान्यताओं के अनुरूप उनका अंतिम दांह संस्कार किया गया।
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सनातन् धर्म, आध्यात्म और वैदिक संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में सर्वे श्रेद्वय, महान् संत, युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी महाराज के अंतिम दर्शन के लिए हजारों की संख्या में भीड़ ने अपनी नम आंखो से अपने आराध्य देव को विदा किया। युगर्षि- श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी महाराज के इस प्रकार से अचानक हमें छोड़कर जाने से समस्त भक्तजनों और श्रद्धालुओं व क्षेत्र के शुभचिंतको को बड़ा ही धक्का लगा। जिसकी हमारे जीवन में कभी भरपाई भी नहीं हो सकती। युगर्षि श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी अपने पिछे एक महान् विचारों की एक विरासत छोड़ गए।
सृष्टि की यह एक अद्वितीय और अद्भुत सच्चाई है और महान् संत के संस्कार एवं सौभाग्य के शुभ प्रसाद की घड़ी थी कि पृथ्वी माता ने अपने लाडले युगर्षि पुत्र को अपने सृष्टि सृजन दिवस पर ही अपने आ़ंचल की गोद में वापिस ग्रहण कर लिया। । ऐसे महानतम् संत और शिक्षाविद युगर्षि श्रेद्वय स्वामी शरणानन्द जी महाराज को साष्टांग कोटि कोटि प्रणाम एवम् नमन् ।
15)
उतराधिकारी गठन एवं गद्दी आसीन दिनांक,13 जुन 2021 (रविवार) को आर्ष गुरुकुल के आचार्य स्वामी प्रद्युम्न जी की गरिमामयी उपस्थिति, गणमान्य श्रद्धालुओं, उपस्थित भक्तजनों, श्रीमद् भगवत् सेवा प्रबंधन समिति सदस्य, ग्राम पंचायत सदस्य, दडौली एवम् अन्य गणमान्य व्यक्तियों की आम सहमति से निर्विरोध निर्विघ्नं निर्विवाद रूप से निर्वाचित करके साधु समाज की परम्परा के अनुसार आचार्य अभयदेव जी को चादर ओढ़ा कर श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम, दड़ौली की गद्दी पर स्वतंत्र महंत के रूप में “स्वच्छद एवं सम्पूर्ण” अधिकारो के साथ पद पर आसीन किया गया। इनके समर्पण भाव को देख कर आचार्य प्रद्युम्न जी के सान्निध्य में साधु समाज ने इनका नाम करण आचार्य अभयदेव जी से बदलकर नया शुभ नाम श्रेद्वय स्वामी समर्पणानन्द जी कर दिया।
श्रीमद् भगवत् सेवा आश्रम प्रमुख महोत्सव-
जन्मोत्सव :- 17 सितम्बर (आयुष्मान् परिवार)
पुण्यतिथि:- 22 अप्रैल (आश्रम कमेटी)
गुरु पुर्णिमा:- तिथि, लग्ननुसार (आश्रम कमेटी)
युगर्षि श्रद्धेय स्वामी शरणानन्द जी की आशीर्वाद का वरदहस्त सदैव हमारे सिर पर बना रहे
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।योगक्षेमं वहाम्यहम्- हमारा कल्याण आपका उत्तरदायित्व है
मानस पुत्र – कैप्टन कीर्ति वीर

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